मौसम से मोहब्बत....

ये मौसम आज कल अपना क्यों लगने लगा है।
जब जब कहूं बरसने को तब तब ये बरसने लगा है।

वैसे तो मैं चाहता हुं हवाओं के साथ उड़ना लेकिन ये बारिश मैं मुझे भीगाता है।
क्या करें इसका भी अलग ही मीज़ाज़ है,
जब जब चाहिए होता है इसका साथ तब तब ये सबको सताता है।
फिर ये रूठे हुए लोगों को मनाने के लिए अपनी मोहब्बत बरसाता है।
लोगों के लाख मना करने पर भी उनको मनाने चला आता है।
हवाओं से बातें करता करता पेड़ों से गले लग जाता है।
जब कोई झूमता है इसकी मोहब्बत में तो ये उसको और नचाता है।
जो रूठा हो किसी बात पे ये उसको भी हंसाता है।
फीलिंग तो बहुत है इसमें तभी तो ये मोहब्बत को समझ जाता है।

ये मौसम है जनाब ना चाहते हुए भी अपनी मोहब्बत बरसा जाता है।

झिलमिलाता हुए जब मोहब्बत से भरी निगाहों से देखता है।
तो हर कोई उसके प्यार में पागल होकर उसकी मोहब्बत में खो जाता है।
अब तो ये गानों में भी , फिल्म के हर रोमेंटिक सीन में आ जाता है।
महफ़िल में बैठे हो या रोमेंटिक कैफे में ये अपनी अटेंडेंस हर बार दे जाता है।
इसके बिना मोहब्बत में वो मज़ा नहीं आता , जो ये बरस कर अपनी और हमारी मोहब्बत दिखाता है।
कोई परेशान होकर बैठा हो तो भी उसको थोड़ी सी स्माइल जरूर देके जाता है।

ये मौसम है जनाब बिन बुलाए भी अपनी मोहब्बत हम पर लुटाता है।


हां कुछ पल ऐसे होते हैं जिनमें इसकी जरूरत नहीं होती।
लेकिन ये अपनी कमी पूरी करने के लिए उन पलों के बीत जाने के बाद चला आता है।
हसीन पलों को देखते देखते ये सबको अपनी मोहब्बत से भीगा जाता है।

क्या ही कहूं अब इसके बारे में,
पता नहीं चलता है किसके इशारे में,
रोते हुए लोगों को हंसाना, और
बरसात में सबको भिगाना,
ये सब करके इसको मज़ा बड़ा आता है।

ये मौसम है जनाब हमको मोहब्बत का समय बताने भी खुद चला आता है।


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