आंखों को छिपाके रखना🖤

 बहुत दिनों से तालाश थी एक कहानी की, 

आज कल मोहब्बत कहां होती है निभाने की,

मैं तो किसी को भी भुला देता हूं

मगर ये दुनिया नही भूलती मोहब्बत पुराने की,

याद रखना है तो आज को याद रखो, क्यों याद रखनी है कहानियां जमाने की।


जानी का किस्सा अलग था, वानी का किस्सा अलग था।

बदनाम हुए हैं दोनो मेरी कलम से,मगर उनकी मोहब्बत का किस्सा भी अलग था ।

लेकिन आज की ये कहानी ना मोहब्बत की है न जमाने की है।

किसी की आंखे दिख गई थी मुझे बस उन आंखों को लफ़्ज़ों से बताने की है।


शुरू, शेरू या शैरी मालूम नही नाम क्या है उसका,मगर जो भी होगा अच्छा ही होगा।

तुम्हारी आंखों की तस्वीर में अपने पन्नो पर सजाना चाहता हूं।

हर रोज उन आंखों को देखने का एक खुआव बनाना चाहता हूं।

ना जाने ऐसा क्या है तुम्हारी आंखों में जो मुझे लिखने पर मजबूर करता है,

शुरू कर दूं क्या लिखना, बस तुमसे लिखने की परमिशन पाना चाहता हूं।


खयाल आया एक मन में हम थोड़ी ना उसे जानते हैं,

लेकिन आखें तो देखी थी ना उसकी चलो उन आंखों में थोड़ा झांकते हैं।

मगर अनुमती थोड़ी ना देगी वो अपनी आंखों से बात करने की,

फिर भी कोई दिक्कत थोड़ी ना है शायर कभी बदनाम करने की कौन सी अनुमती मांगते हैं।


शुरू, शैरी या शेरू 

ऐसा कौन सा नशा है जो तुम्हारी आंखें करती हैं।

एक ही दफा तो देखा हमने फिर भी इतना जाम भरती हैं।

थोड़ा छुपाके रखा करो अपनी इन आंखों को, ये तो हर कहीं कत्लेआम करती हैं।


दोबारा अगर में कहानी ढूंढ रहा होगा तो अपनी आंखों से कह देना मेरे सामने आना मत।

हां, अगर कहानी तुम्हारी आंखे बन गई तो उनको बोल देना मेरी आंखों के सामने से कहीं जाना मत।


अगर चाहते हो की कहीं जीकर न हो तुम्हारी आंखों का तो अपनी आंखें मुझसे छिपाके रखना।

अगर कहानियां पसंद हैं किसी शायर की तो सिर्फ शायरी से ही दिल लगा कर रखना।


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