सफर ज़िन्दगी का
वो सफर भी क्या सफर था यूं मोहब्बत के कुछ खतों का रुक जाना।
पहले पास रहकर भी दूर थे अब दूर रहकर भी पास ना आना।
साथ मिलकर कुछ खुआंब देखते थे अब उन्हीं सपनों में फिर डूब जाना।
वो सफर भी क्या सफर था यूं मोहब्बत के कुछ खतों का रुक जाना।
हर पल उनकी आदत को खुद की आदत बनाना ।
वो करते थे तारीफ किसी और की हम खुद की तारीफ समझ जाना।
बहुत कोशिश करते थे हमसे ना मिलने की आज मिलकर भी कुछ नहीं कर पाना।
वो सफर भी क्या सफर था यूं मोहब्बत के कुछ खतों का रुक जाना।
हम वक्त की हकीकत थे और वो बक्त का फ़साना।
वो मुसाफिर थे उस मंजिल के और हम चाहते थे उनकी गाड़ी चलाना।
हम थक जाते थे उनको याद करते करते और बो हर बार बनाते थे भूलने का बहाना।
तारीफ करता हूं कुछ कागजों पर उनकी लेकिन बाद में उन कागजों को जलाना।
कभी आईने में चेहरा बदल सकूं तो तुम वापिस मेरी ज़िन्दगी में आना।
मुझे फिर से तुम समझना और मुझे फिर से मुझे आजमाना।
वो सफर भी क्या सफर था यूं मोहब्बत के कुछ खतों का रुक जाना।
हम आज भी याद करते हैं उनको बस उनको याद नहीं रहता थोड़ा सा मुस्कुराना।
जिंदगी रही हमारी तो मिलेंगे उस सफर में तुम फिर से मुझे तड़फना।
याद रखूंगा वो सारे तुम्हारे निक नेम बस तुम मुझे भूल जाना।
वो सफर भी क्या सफर था यूं मोहब्बत के कुछ खतों का रुक जाना।
Comments
Post a Comment