AAZAAD PARINDA

खुआबो की दुनिया का मैं एक कैद परिंदा बन गया। शब्दों मे लिपटा एक उलझन सा दरिंदा बन गया। मंजिल मेरे पास थी  फिर भी उसको दूर करके सिम्बा बन गया। कुछ रंगों के साथ मिलकर रंगीन होना चाहता था। लेकिन आसमान मे उड़ते उड़ते आज़ाद परिंदा बन गया। 


दरिया मे  डूबा एक जहाज़ हूँ मैं ,अपने ही अरमानो मे झुझता नाराज हूँ मैं। विनती है उनसे ज़िन्दगी दी है जिस खुदा ने ,झूठे  जस्बातों मे  डुबकर बंद  आबाज हुँ मैं। 

चलते चलते राह मे एक दिल का पैगाम मिल गया। बस उसी के दिल  का मैं एक हसीं सा पना बन गया। 

   

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