एक तरफ़ा प्यार

उन मोहबत की गलियों से मैं भी गुजरा था। टूटे हुए कांच की तरह मैं भी बिखरा था। 
खुआब तो मैंने भी इतने सजाए थे,जब मेरे दिल ने प्यार के जाल बिछाये थे। 
भूल गया था मैं  एक तरफ़ा प्यार कभी पूरा नहीं होता। फिर भी मैंने उसके साथ जीने के खुआब बुनाये  थे। 
यूँ तो मैं भी बैचैन हो रहा था उस से मिलने के लिए,पर उसके दिल ने भी किसी और के दिल के साथ घर बसाये थे। 
मैं ठहरा पागल सा फिर भी उस से मोहब्बत कर बैठा,पर उसने भी अपने सपने किसी और के साथ सजाये थे। 

मैंने तो सोचा की वो भी मुझसे प्यार कर लेगी।आज नहीं तो कल वो इकरार कर देगी। 
उसके चेहरे पर क्या नूर था। उसका दिल किसी और के पास था और में मजबूर था। 
वरना प्यार में दिलों के बीच दूरी कहाँ होती है। और एक तरफ़ा प्यार मैं मजबूरी कहाँ होती है।  


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