आस्था को भीतर जगह दें, डर बाहर चला जायेगा

हम में से ऐसे कितने लोग हैं ,जिन्होंने उन पलों को बहुत ध्यान से देखा होगा, जब कोई छोटा सा बच्चा अपने माँ पापा की उँगलियाँ पकड़ के शहर के सबसे व्यस्त रोड को पार करता है। तो आपने देखा होगा की वह बच्चा फुदकता रहता है, कोए ,कुत्ते और या जिस भी चीज पर उसकी निगाह पड़े ,उसे वह गौर से देखने व पकडने की कोशिश करता है। सड़क पार करते  समय उस बच्चे के दिमाग या शरीर मे डर का कोई लक्षण नहीं होता। वास्तब मे ये उसके लिए एक खेल है। ऐसा इसलिए होता है ,क्योंकि बच्चा सड़क पार करने की जिम्मेदारी अपने माता पिता पर छोड़ देता है। 
आस्था का मतलब है यह जानना कि "जिस शक्ति ने मुझे इस स्थिति मे डाला है वह उसे पार भी लगाएगी।"
जब आस्था नहीं होती तो आपका परिचय डर से होता है। और जब आस्था होती है तो डर के लिए कोई जगह नहीं होगी, क्योंकि आस्था और डर साथ में नहीं रह सकते। 
आप कहाबत याद रखें : भय ने दरबाज़ा खटखटाया और आस्था ने जवाब दिया 'यहां कोई नहीं है '
 तो आप समझ जाना क़ि आपके अंदर भय नहीं है।              

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