दया को सिर्फ अक्षमता से मत जोड़िए

नाशिक शहर मे सोमवार का दिन बारिश मे भीगा हुआ दिन था। घर से दूर रह कर पढ़ रहे उन लड़को के कमरे मे बड़ी बेचैनी थी। वे बाहर इंतज़ार की मुद्रा मे खड़े थे, क्योंकि उन्हें एक कप चाय की दरकार थी जो उन्हें ताज़गी और गर्माहट दे सके। लेकिन, टखनों तक पानी से भरे रास्ते ने उनकी चिंता बढ़ा दी थी। उनकी आंखें सड़क के  एक कोने पर ऐसी जमी थी, मानो कोई बस आने ही वाला है। परेशानी यही थी की उनका गैस सिलिंडर खतम हो गया था, और ऑनलाइन बुकिंग के बाद भी अब तक उनके पास नहीं पहुंचा था। 
अचानक खुशी की एक लहर सी उठती है। लड़के देखते हैं कि पूरी तरह भीगा एक आदमी कंधे पर सिलिंडर लादे हुए, कीचड और पानी मे पैर जमाता हुआ उनकी ओर आ रहा है। तुरंत एक लड़का मदद को आगे बढ़ा, दूसरा  कमरे से उसके लिए तौलिया उतार लाया, तीसरा उसे अपना रैनकोट देने को तैयार था और चौथे ने उसके लिए गरमा -गरम चाय बनाई ! 

वाकई, ये अंडरग्रेजुएट लड़के अपने कामो से सन्देश दे रहे थे -जरूरत पड़े तो अक्षम ही नहीं, सक्षम के लिए भी दया  दिखाइए।              

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